गुरुवार, 4 जून 2015

शिखरिणी छन्द - हिन्दी में

तुम्हें कैसे बोलें, कब तक कहेंगे न इसको,
--- तुम्हारी बातें हैं, तुम बिन कहें भी तो किसको ।
तुम्हें देखा जैसे, मुझ पर हुआ ये असर है,
--- तुम्हारी मुस्कानें, हर जगह पाऊँ बिखरती ॥

{{स्पष्टीकरण - १ - हिन्दी में म्ह स्वयं में एक ध्वनि है न कि संयुक्त वर्ण, यद्यपि संयुक्त के रूप में लिखा जाता है । २ - हिन्दी में ए और ओ को ह्रस्व तथा दीर्घ दोनों प्रकार से उच्चारित किया जाता है । दूसरे चरण में आने वाला ‘तो’ शब्द ह्रस्व रूप में पढ़ा जाए ।}}

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

कितना सुन्दर होगा अगर हर रिश्ते से मिलने वाले लाभ का मौद्रिक आकलन किया जा सके

यह बात उठी एक अंग्रेजी लेख से जिसका शीर्षक है This Guy Says He Can’t Afford His Wife. Once You Read This, You’ll Realise He’s Totally Right जो कि इस लिंक पर उपलब्ध है - http://pulptastic.com/guy-says-cant-afford-wife-stay-home-mom-hes-right/
पहले लेख का सारांश-
स्टीवेन नेम्स ने अपने पुत्र के जन्म के बाद अपनी पत्नी ग्लोरी के योगदान का मौद्रिक आकलन किया है । आकलन करते हुए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यदि ग्लोरी के किये कामों का वेतन राष्ट्रीय औसत के हिसाब से दिया जाए तो यह सालाना ७३,९६० डालर बैठता है जो कि खुद स्टीवन की आय का लगभग दोगुना है । इस आधार पर वे कहते हैं कि पत्नी का घर पर रहकर काम करना वे अफ़ोर्ड नहीं कर सकते । पत्नी के बहुमूल्य योगदान को बड़ी विनम्रता और आदर के साथ स्वीकार किया है ।

जिन कामों को उन्होंने अनुसूचित किया है लगभग वे सारे काम (और कभी कभी अधिक भी) अधिकतर भारतीय गृहिणियाँ भी करती हैं । कामकाजी महिलाएँ तो बाहर की नौकरी के अलावा भी ये सारे काम करती हैं । अकेले रहने वाले पुरुष जब घर की और कपड़ों की सफाई करने बैठते हैं तो कभी कभी शायद उन्हें अहसास हो जाता है कि औरत को कितना काम करना पड़ता है (कम से कम मुझे तो होता है) ।

अब मुख्य मुद्दे की बात-
कैसा हो यदि सभी रिश्तों के योगदान का मौद्रिक आकलन किया जा सके? सबसे पहले खाद्य पदार्थों का आकलन । रोटी को लेते हैं । गेहूँ का मूल्य १५ रुपये किलो के आस पास है । खेतिहर मजदूर को अकुशल मजदूर माना जाता है पर यह एक कुशलता का काम है । मजदूर के श्रम का आकलन बहुत ही नीचा है । चलो इसे शहरों के कारीगरों के अनुसार नापते हैं । एक प्लंबर शहर में आधे या एक घंटे का आराम से चार पाँच सौ चार्ज करता है । कृषि मजदूर का वेतन उस हिसाब से तय किया जाए (दैनिक छः घण्टे) तो प्रति दिन ढाई-तीन हजार बैठता है । गेहूँ की फसल चार महीने में पकती है और मान लें कि कुल एक महीने का गहन काम होता है (जुताई, बुवाई, दो सिचाई, दो-तीन बार खाद, निराई या कीटनाशक, कटाई, खँदाई या गहाई (थ्रेशिंग) और ढुलाई) और बाकी समय छुट्टी । और मान लो चार बीघे में चार लोग लगते हैं इस प्रकार प्रति बीघा एक व्यक्ति । तो एक बीघे की श्रम लागत 25000 x 30 = 750000 रुपये बैठती है । उस खेत में उत्तम फसल होने पर प्रति बीघे चार कुंतल गेहूँ पैदा होता है । इस प्रकार प्रति किलो गेहूँ में श्रम की लागत ७५००००/४०० = १८७५ रुपये बैठती है । बाकी बीज, सिंचाई आदि के २५ रुपये और जोड़ लो तो १९०० रुपये प्रति किलो गेहूँ बाजार में उपलब्ध होगा । अनुमान लगाओ कि कितने लोगों की थाली में रोटी होती और कितने लोग आज जीवित होते ।

दूसरा उदाहरण बॉयफ़्रैंड का । हमने बॉयफ़्रैंडों को अनेक भूमिकाएँ निभाते देखा है - सिक्योरिटी गार्ड की तरह सुरक्षा, प्रेयसी के लिए अपने हाथ से बस स्टॉप की बेंच साफ करता सफाई कर्मी, माता पिता की तरह उसकी हर जरूरत का खयाल रखने वाला (धन से और ध्यान से), यदि उसके पास अपनी गाड़ी हुई तो हर जगह ले जाता हुआ, प्रेयसी के लिये नोट्स और असाइनमेंट का जुगाड़ करता हुआ या खुद बनाता हुआ -- कितनी प्रकार की सेवाएँ देते हैं । इस प्रकार अफ़ोर्डेबिलिटी का आकलन किया जाए तो कुछ करोड़पति परिवारों की लड़कियों के अलावा कोई लड़की बॉयफ़्रैंड अफ़ोर्ड नहीं कर सकती । सोचो कितने रिश्ते बनेंगे और कितने बचेंगे यदि इस प्रकार रिश्तों का मौद्रिक आकलन किया जाए ।

बुधवार, 6 जून 2012

शुक्र पारगमन - ६-६-१२


सूर्य प्रतिबिम्ब में शुक्र की छाया

आज हम शुक्र पारगमन के लिए सूर्योदय से पहले उठे । यह बहुत लम्बे समय के बाद हुआ था । सूर्य के बिम्ब को आज शुक्र ने पार किया । इसे देखने का सबसे अच्छा समय सूर्योदय का समय था जब सूर्य को सीधे देखना सम्भव था । पर निकले ही थे कि ऊपर बादल घिर आए । पहले से दिखता हुआ चाँद भी छिप गया । फिर भी हम पीएसआर - पार्थसारथी शिला पर बैठ गए जो हमारे विश्वविद्यालय का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर है । बैठे थे सूर्योदय, और सूर्य पर पार करते हुए शुक्र को देखने के लिए । पर बादल । थोड़ी आशा बँधी कि ऊपर और पश्चिम से बादल छँटने लगे । हम बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब बादल हटें तो सूर्य प्रकट हो और हम शुक्र पारगमन देख सकें । इच्छित दृश्य में बाधक सुन्दर दृश्यों की फ़ोटो भी बीच-बीच में ले ले रहे थे । पाँच बजे से पहले से बैठे थे पर छः बजे तक प्रतीक्षा करने के बाद हम वहाँ से चल दिए । जब देख लिया था कि सूर्य की रोशनी जो बादलों के बीच से झाँक रही थी, वह तेज हो गई थी ।

फिर स्टेडियम में दो चक्कर लगाए, दौड़कर नहीं, टहलते हुए । फिर लौट आए अपने छात्रावास । उठने से नाश्ता करने तक का रूटीन दोहराया । महीनों बाद नाश्ता मिलने की शुरुआत में हमने नाश्ता लिया था । नाश्ता लेकर हम संस्कृत सेंटर की ओर चल पड़े, पहले से सोचा हुआ शुक्र पारगमन (venus transit) देखने का वैकल्पिक मार्ग अपनाने के लिए । अरे हाँ, बीच की एक बात बताना तो भूल ही गए । हॉस्टल में आकर एक और वैकल्पिक तरीका अपनाया पर देखने में असफल रहे । एक चार्ट के टुकड़े पर छोटा सा छेद करके, उससे निकलती किरण से दूसरे चार्ट पर सूर्य का उल्टा प्रतिबिम्ब बनाने का । देखा था कि धूप तेज हो गई थी सात बजे । पर उसमें पर्याप्त साफ नहीं दिखाई दे रहा था । इसलिए ऐसा ही प्लान जो संस्कृत सेंटर में करने का बनाया था, उसपर भी आशा क्षीण हो गई । अब तीसरा विकल्प ही सबसे भरोसेमन्द था जो हम आठ-नौ साल पहले, लखनऊ विश्वविद्यालय में, बीए तृतीय वर्ष के छात्र रहते हुए, लाल बहादुर शास्त्री छात्रावास में अपना चुके थे । पर जगह की योजना नहीं बनी थी कि कहाँ इस प्लान को अंजाम देंगे ।

प्रतिबिम्ब बनाने वाला उपकरण
खैर नाश्ता करके जल्दी-जल्दी सेंटर आए । छोटा सा शीशा (एक इंच आकार का, फ़्रेम सहित दो इंच का) कमरे से ही जेब में रखकर ले आए थे । बाई चांस क्षितिज (इसे व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में लें, सूर्य के प्रसंग में अर्थभ्रम हो सकता है) का भी आगमन उसी समय हुआ । पौने नौ बजे हम आए और देखने लगे कि कहाँ सूर्य को प्रतिबिम्बित किया जा सकता है । देखा कि सेंटर के आँगन में अच्छी खासी धूप आ चुकी । ऊपरी मंजिल पर गए तो एक गैलरी सूनी मिली । ऊपर की खिड़कियाँ भी छोटी हैं और उस गैलरी का अन्तिम छोर अँधेरा रहता है अगर लाइट न जल रही हो तो । वाह, यह तो बड़ी आसानी से मिल गया । शीशे से प्रतिबिम्ब गैलरी के छोर पर डाला । बिलकुल सूर्य के आकार का एकदम गोल सफेद प्रतिबिम्ब बन रहा था टाइल्स पर । पर हाथ में पकड़े हुए शीशा हिल रहा ता । दर्पण को स्थिर करने के लिए स्टैंड ? अरे रखा है न, थर्माकोल । वही जो इंटरैक्टिव व्हाइट बोर्ड के पैक से निकला था और हमने लैब में सम्याल कर रख लिया था । बस, जमीन पर थर्माकोल को लिटाकर उसमें दर्पण को आंशिक रूप से गाड़ दिया थोड़ा टेढ़ा करके । बस प्रतिबिम्ब स्थिर हो गया । और हमारा जी खुश हो गया । हमने उस प्रतिबिम्ब की फ़ोटो ली । और उस प्रतिबिम्ब को बनाने वाले उपकरण के महत्त्व को कैसे उपेक्षित किया जा सकता है । उसकी भी फ़ोटो ली । उन्हें फ़ेसबुक के अपने प्रोफ़ाइल पर लगाया है । आप सूर्य बिम्ब में नीचे बाईं ओर शुक्र बिम्ब की छाया देख सकते हैं ।

रविवार, 27 मई 2012

राजू पासवान ने चोर पकड़ा


लखनऊ विश्वविद्यालय के लाल बहादुर शास्त्री छात्रावास में कुछ ही डबल सीटेड कमरे हैं । उनमें १२ नंबर में हम रहते थे । बीए के पहले साल में मेरा रूममेट विनय था और दूसरे साल में राजू पासवान, जो कि चम्पारन से था और हमसे एक साल जूनियर था ।
दूसरे साल की गर्मियों में जनसंख्या कम होती है । इसका फ़ायदा उठाकर चोर बाथरूम से वाश-बेसिन की टोंटी चुरा ले जाते थे । बाथरूम हमारे कमरे के सामने ही था । टोंटी चुराने के लिए वाशबेसिन को तोड़ना पड़ता था । हम घर में थे और राजू हॉस्टल में । एक-दो दिन पहले ही एक टोंटी चुराई जा चुकी थी । दोपहर को राजू सो रहा था तब उसने बाथरूम में खट-खट की आवाज सुनी । ऊँघते हुए ही वह बाथरूम में गया । उसका मन सजग था पर चेहरा ऊँघता ही बना रखा था । एक वाशबेसिन थोड़ा टूटा हुआ था । वहाँ एक आदमी था जो उस समय हाथ धोने जैसा कुछ कुछ कर रहा था, चुपचाप । वह चुपचाप कमरे में लौट आया । अगर चोर जान जाता है कि उसे पहचान लिया गया है तो भाग जाएगा । अकेले पकड़ना मुश्किल है । अब वह क्या करे?
वह फिर से बाथरूम में गया ।
"भैया जरा तखत पकड़ा देंगे? उसे एक जगह से दूसरी जगह रखना है ।"
"चलो ।"
दोनों कमरे में आ गए ।
"अकेले होगा नहीं, आप यहाँ बैठिये, हम कुछ और लोगों को बुला लाते हैं ।"
"ठीक है ।"
राजू ने धीरे से दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया, बिना आवाज किये । फिर हॉस्टल से कई लड़कों को बुला लाया । फिर चोर के साथ जो होना था हुआ । चोर नहीं जानता था कि एक ऊँघते हुए लड़के से भी काफ़ी सावधान रहने की जरूरत थी उसे बचने के लिए ।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

हम भला क्यों कहें

जो तुम समझ न पाओ, कहने से क्या मिलेगा
पर तुम जो समझ जाओ, कहने की क्या जरूरत

इसलिए ही अभी तक, कुछ भी कहा न तुमसे
जब ख़ुद ही से तुम समझो, आएगा कब मुहूरत

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

एक बच्चे का बच्चे सा दिल

एक बच्चे का बच्चे सा दिल बचकानी हरकत करता है
वह बच्चा वह हरकत दिल की दिखलाने में भी डरता है
जोर बहुत देते हैं सब कि जो दिल में है खोल के रख दो
लोग न समझेंगे इस कारण कुछ कह पाने में डरता है

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मत रोको खुद को

मुझे पता है कि बेकरार हो तुम भी मुझसे मिलने को ।
कुछ तो मजबूरियाँ और कुछ उसूल रोके हैं ॥

जो कुछ भी तुम्हें रोकता हो, डराता हो तुम्हें इसके लिए ।
छोड़ो उन्हें कह दो कि ये नज़रों के धोखे हैं ॥

बातें बहुत सी करेंगे लोग तुमको डराने धमकाने को ।
सोच लो ध्वनि तरंगें हैं या हवा के झोंके हैं ॥

नहीं डरना है तुमको हमको इन विघ्न बाधाओं से ।
दुनिया वाले तो अपनी पूरी ताकत झोंके हैं ॥

बुधवार, 16 मार्च 2011

भगवान के प्यारे

भगवान के प्यारे होने के लोग कई अर्थ लगाते हैं । कई अर्थ होते भी हैं । मुझे सबसे प्रिय अर्थ वह है- पिताजी अक्सर कहा करते हैं कि भगवान् कहते हैं कि जो मेरा बहुत प्रिय होता है, उसका हम सब कुछ छीन लेते हैं । जब एक एक करके बहुत सी चीज़ें अपने पास से छूटते देखता, और यह क्रम एक ही दिशा में चलता रहता, तो कष्ट तो बहुत होता था, पर यह बात याद करके खुशी भी मिलती थी कि मैं भगवान् का प्यारा हूँ । और यह मैं अपने को दिलासा देने के लिए ऐसे ही नहीं कह रहा । हमें भगवान् का प्यारा होने का पूरा विश्वास भी है । भगवान का प्यारा मैं केवल तब ही नहीं था जब (सब नहीं) बहुत कुछ छिनता दिखाई देता था, जब हमारे पास बहुत कुछ है, तब भी मैं भगवान का प्यारा हूँ । कोई अगर कहे कि क्या सबूत है, तो इसकी कोई जरूरत नहीं । सबूत तो दूसरों के लिए होता है, अपने लिए तो विश्वास ही पर्याप्त है ।

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

डिस्कवर ऑफ़ ए रिसर्चर



यहाँ मैं वह घटना शेयर करना चाह रहा हूँ जिस लम्बी प्रक्रिया के तहत मेरी मोटरसाइकिल खरीदने का निश्चय किया गया । उमेश जी की बजाज डिस्कवर चलाने में बहुत मजा आ रहा था क्योंकि मेरा अभ्यास कम था फिर भी उसे चलाना बड़ा सहज लगता था । सर मुझे बार बार खुश रहने की सलाह देते रहते थे । खुश रहने के अलग-अलग तरीके बताते । इन्हीं तरीकों में उन्होंने एक बार बता दिया कि एक बाइक खरीद लीजिए । ऐसी कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं थी । धीरे धीरे मन बनने लगा तो सोचा कि डिस्कवर ही ली जाए, उसे चलाने में ज्यादा मज़ा आता है । सर की गाड़ी भी डिस्कवर थी । उनके पास कार थी फिर भी शौक के लिए उन्होंने मोटरसाइकिल खरीदी थी । उमेश जी की ११२ सीसी की थी और सर की १२५ की । एक बार सर की मोटरसाइकिल से बुके लेने जाना हुआ । उसे चलाकर तो आनन्द ही आ गया । वह जैसे इशारा समझती थी । तभी सोच लिया कि गाड़ी लेनी है तो दमदार ही लेनी है । फिर मेरे पास ऐसा समय आया कि खाते में बहुत कम रूपये रह गए । मोटरसाइकिल लेने की इच्छा पृष्ठभूमि में चली गई । सुरजीत ने भी कई बार मेरी मोटरसाइकिल लेने की इच्छा का समर्थन किया था । अक्टूबर के प्रारम्भ की यह बात है । फिर उसके बाद कुछ ही दिनों में कुछ जगहों से गया हुआ रूपया वापस आने लगा और हमारे खाते में मोटरसाइकिल लेने भर के रुपये इकट्ठे हो गए । तब निराश होती मोटरसाइकिल लेने की इच्छा फिर से उत्साह पा गई । और १२-१३ तारीख को तय कर लिया कि मोटरसाइकिल ले लेंगे (रुपये तो रुकते नहीं हैं हमारे पास, कोई चीज़ होगी तो वह ज्यादा रुकेगी) । सर की प्रेरणा भी काफ़ी काम कर रही थी । तब हमने सोचा कि घर में बता दें, नहीं तो अच्छा नहीं लगेगा कि इतने बड़े काम को भी बताया ।

पिताजी को फ़ोन करके बताया कि एक मोटरसाइकिल लेना चाह रहे हैं । हमारी इच्छा थी की पिताजी की सहमति के साथ ही लें । और अपने मन की भी करना चाहते थे । सर की प्रेरणा के हिसाब से ऐसी मोटरसाइकिल लेना चाहते थे जिसके साथ हम खुश रहें । अगर खुशी न मिले तो मुख्य उद्देश्य ही नहीं पूरा होगा । जब दोनों बातें एक दिशा में हों तो बहुत आसान हो जाता है । जब दोनों मतियाँ हर कदम पर अलग अलग हों, और दोनों को साथ लेकर चलना हो तो बात दूसरी होती है । अब देखिये अपनी मर्जी और पिताजी की सहमति का सन्तुलन कितना होता है...

मैं - पिताजी ! हम एक मोटरसाइकिल लेना चाहते हैं
पिताजी - क्या करोगे लेकर? क्या जरूरत है? रहने दो
- हम लेना चाह रहे हैं
- रहने दो लेने को, या फिर यहाँ कोई सेकेंड हैंड देख लेंगे (पिताजी को नहीं भरोसा था कि मैं चला सकता हूँ)
- हम नई लेना चाह रहे हैं
- नई रहने दो, यहाँ दीवाली को आओगे तो बात करेंगे
- हम परसों धनतेरस को लेना चाह रहे हैं
- मोटरसाइकिल लेकर क्या करोगे? सीधे चार पहिये वाली गाड़ी लेना
- उसका समय अभी बहुत दूर है । अभी तो मोटरसाइकिल ले लें
- नहीं ले सकोगे तो मिल जाएगी (व्याख्या की जरूरत नहीं, मैं इससे सहमत नहीं)
- मुझे दूसरे से नहीं लेनी । मुझे अपनी गाड़ी लेनी है
- ठीक है अभी रहने दो, जब यहाँ आओगे तो बात करेंगे

फिर घर में भाई बहनों ने कहा कि ले लेने दो, कभी कुछ माँगते नहीं हैं । अपने लिए कुछ लेना चाह रहे हैं तो ले लेने दो । तब पिताजी ने फिर फोन किया ।

- सभी कह रहे हैं कि ले लेने दो । मोटरसाइकिल रहने दो, स्कूटी ले लो तो बहनें भी चला सकेंगी
- हम बड़ी मोटरसाइकिल लेना चाह रहे हैं
- कौन सी लेना चाह रहे हो
- डिस्कवर
- डिस्कवर तो बजाज की है । लोग बताते हैं कि बजाज की गाड़ियाँ ज्यादा मजबूत नहीं रहतीं । लेना तो हॉण्डा की लेना
- मुझे डिस्कवर पसन्द है । वह चलाने में अच्छी लगती है
- बजाज की रहने दो, उसको सेकेंड हैंड बेचने पर अच्छे दाम नहीं मिलते । हॉण्डा की रिसेल वैल्यू ज्यादा है
- हम अपने लिए खरीद रहे हैं, बेचने के लिए थोड़े ही, बेचने की क्या जरूरत
- जब दूसरी गाड़ी लोगे, यह पुरानी हो जाएगी तो बेचने का मन करे तो?
- हमारी स्थिति अभी इतनी नहीं है कि बार बार बाइक बदलते रहें । बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी
- ठीक है जैसा ठीक लगे वो करना । वैसे बजाज का एवरेज भी अच्छा रहता है पर रिसेल वैल्यू और टिकाऊपन कम होता है
- ठीक है

दादा ने अगले दिन फोन करके कहा हॉण्डा की अच्छी रहती है । अगर बड़ी गाड़ी ही लेनी है तो उसी की पैशन ले सकते हो
भांजे ने (तब ९ साल का) भी कहा कि कह दो कि बजाज की गाड़ी न लेना । हॉण्डा की लेना (उसके घर में है, इसीलिए उसे पसन्द है)
हम इतनी बड़ी गाड़ी नहीं लेना चाहते थे कि हम ही उस पर छोटे लगें । इस हिसाब से डिस्कवर सबसे फिट पड़ रही थी ।

अगले दिन फिर पिताजी ने फोन किया
- जब डिस्कवर ही लेना है तो छोटी वाली लेना । एक १०० सीसी की आती है और एक १३५ सीसी की । छोटी वाली लेना उसमें एवरेज ज्यादा रहेगा, उसमें पाँच गियर हैं । अभी भी सस्ती रहेगी, चलती भी अच्छी है और एवरेज ज्यादा है, आगे भी उसपे खर्च कम रहेगा
- ठीक है, लेते समय देखेंगे

हमने तो १२५ सीसी की पसन्द की थी । दुकान में केवल दो संस्करण थे - १०० सीसी और १३५ सीसी । १२५ में कोई दुविधा नहीं थी । अब ये दो चरम की तरह थे । एक तरफ़ अभी कम खर्च, आगे कम खर्च, ५ गियर, देखने में भी साइज़ छोटा नहीं । दूसरी तरफ़ अच्छा पिक-अप, चलाने में आनन्द, ज्यादा चलना हो तो उसके लिए ज्यादा दम । काफ़ी देर लगाई निर्णय करने में । सुरजीत जी और उमेश जी साथ गए थे । धनतेरस का दिन चुना था । १५ अक्टूबर २००९ । हम बड़ी वाली डिस्कवर लेकर आ गए । डिस्कवर ऑफ़ ए रिसर्चर ।

हर बात पर पिताजी सहमत हो गए थे । बस एक चीज़ बाकी थी, यदि छोटी डिस्कवर या हॉण्डा लेते तो और भी सन्तुष्ट रहते । घर जाकर जब घर वाली मोटरसाइकिल चलाई और अपना अनुभव बताया पिताजी को- इस मोटरसाइकिल पर मेरा कंट्रोल अच्छा नहीं रहता, अपनी वाली मुझसे अच्छी चलती है । तब पिताजी सन्तुष्ट हो गए - तो फिर ठीक है ।

हम खुश हैं अपनी इस मोटरसाइकिल - “डिस्कवर ऑफ़ ए रिसर्चर”के साथ .... :)

रविवार, 19 दिसंबर 2010

घटना जो चुटकुला बन गई

आलोक उलफ़त जी हम लोगों को सुना रहे थे -
दुनिया में आए हो तो कुछ ऐसा काम करो कदरदान
कि जिस गली से गुज़रो आवाज़ आए अब्बा जान ! अब्बा जान !

यहाँ घटना शेयर कर रहा हूँ, जो चुटकुला बन गया

तभी कुछ और लड़के उसी लॉन के पास आए
आलोक उलफ़त जी ने उनसे मुखातिब होकर ज़ोर से फ़िर कहा -
दुनिया में आए हो तो कुछ ऐसा काम करो कदरदान

वे लड़के प्रसंग नहीं जानते थे, और बोल पड़े -
वही तो करके आ रहे हैं....

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

रात कली एक ख्वाब में आई

रात कली एक ख्वाब में आई
और पूछने लगी

बताओ ऐसी कौन सी कली है जो खिलती नहीं
मैं बताने चला तो उसने रोककर कहा-
छिपकली को छोड़कर

मैंने गिनाना शुरू कर दिया--

बेसिकली
आटोमैटिकली
मैथमैटिकली
वर्टिकली
पीरियॉडिकली
फिज़िकली
केमिकली
इकोनॉम्निकली
लॉजिकली
अकेडमिकली

उसने रोककर फिर से ताली बजाते हुए कहा-- हार गए ! हार गए ! मैंने कौन सी कली - एकवचन में पूछा था - तुमने दस बता दिये ।

सचमुच ऐसी कलियों से बातों में जीतना मुशकिल है

एक और गज़ल - तुम जा नहीं सकती

है इतनी ठंड कि माचिस इसे सुलगा नहीं सकती
जगाने की तो छोड़ो ठीक से ये हिला नहीं सकती ॥

तुम्हारी ज्यादती से है बड़ा धीरज मेरा ऐसे
कि कुछ भी करके मेरी नफ़रतें तुम पा नहीं सकती ।

है इतनी सूक्ष्म अपनी भावना कि जल नहीं सकती
जल भी भिगो नहीं सकता पवन भी सुखा नहीं सकती ॥

की तुमने खूब कोशिश कि सदा लड़ता रहूँ तुमसे
मैं लड़ना जो न चाहूँ तो तुम मुझको लड़ा नहीं सकती ।

तुम्हारी भावना का ख्याल करके छूट दी तुमको
जो ढंग से चाह लूँ तो और कहीं तुम जा नहीं सकती ॥

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

एक ग़ज़ल और दो से अधिक शेर की

वे सुनना न चाहें तो कोई कैसे कह पाए
इतनी बातें अपने अन्दर कैसे दबाए ।

हम उनकी नज़र में पड़े बार बार
पर उन्हें बड़ी मुश्किल से नज़र आए ।

किसी से बताता नहीं उलझन अपनी
कोई भला हल कोई कैसे सुझाए ।

है बहुत धीरज सब ख़ुद में छिपा लेने का
पर धीरज का सागर वो कहाँ से लाए ।

रात और दिन में थोड़ा तो भला फ़र्क करो
दिन में रखो होश औ रात में सपना आए ।

लोग कहते हैं कि बोला करो सीधा थोड़ा
बात सूर्यांशी की भला किसको समझ में आए ।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

लव कम अरेंज ज्यादा

विवाह कितने प्रकार के होते हैं, पहले से पढ़ते आए हैं कि आठ प्रकार के ।
ब्राह्मो दैवस्तथा चार्षः प्राजापत्यः तथाऽऽसुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥
सन्दर्भ मत पूछना । क्योंकि मेरा बताने का मन नहीं है । क्योंकि जो मानने वाले हैं, उन्हें विश्वास करने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि परम्परा में प्रसिद्ध आठ विवाह प्रकार यही हैं । मतभेद केवल क्रम में तथा उनके विधि-विधान में है । इनमें से कोई तो चलन में हैं और कोई चलन में नहीं हैं । कोई विकृत रूप में चलन में हैं पर विवाह के रूप में पहचाने नहीं जाते और चाहिए भी नहीं । कोई अगर दण्डनीय अपराध करे तो उसको समर्पित होकर उसे पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए बल्कि ऐसी सज़ा देनी चाहिए कि फिर वह किसी के साथ वैसा अपराध करने से डरे । पर विवाहों के यही प्रकार चलन में नहीं हैं, इनसे अलग भी प्रकार चलन में हैं । विशुद्ध रूप में इन प्रकार के विवाह तो नहीं ही चलन में हैं, बल्कि एक से अधिक प्रकार का मिश्रण उसके विधि-विधान में होता है । अन्दरूनी भावना या प्रक्रिया जिसके अधिक निकट होती है उसे उस विवाह के रूप में पहचाना जा सकता है । हिन्दुओं का प्रचलित पारम्परिक विवाह प्राजापत्य विवाह के सबसे निकट है इसलिए इसे प्राजापत्य विवाह कहा जा सकता है ।
विवाहों की यही संख्या पूर्ण नहीं है । ये तो केवल हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह हैं । दूसरे धर्म की विवाह रीतियाँ होती हैं । कुछ तो धर्म से चिढ़कर धार्मिक तरीकों को पद्धति से निकालकर शेष से नई पद्धति बनाकर विवाह करते हैं । हिन्दुओं के भी सभी विवाह इन आठ प्रकारों में अधिकतर परिभाषित किए जा सकते हैं । जैसे जनजातियों की विवाह पद्धति अक्सर आसपास के समाज से मिलती हुई होती है पर कई बार उनसे अलग भी होती है । कई प्रकार इन आठ प्रकारों में वर्गीकृत किए जा सकते हैं और कुछ नहीं भी किए जा सकते । कभी जब दो धर्मों के लोग विवाह करते हैं तो या तो उनमें से एक धर्म के तरीके से विवाह होता है या दोनों को मिलाकर संकर तरीके से । चाटत्व एक गुण है जिससे कथनीय बात खुली रखते हुए भी अधिकारी के लिए सुरक्षित की जा सकती है । ऐसा कवच है जिसे भेदकर ही कोई कथ्य तक पहुँच सकता है अगर धीरज रखे और ऊब न जाए । इसीलिए किन बातों से मैं क्या कहने वाला हूँ सभी नहीं जान सकते ।
इन विवाहों के अलावा भी कुछ प्रकार होते हैं । एक स्वर्गारोहण विवाह होता है । आपने चुटकुला सुना होगा - मेरी बेटी जिस घर में जाएगी उस घर को स्वर्ग बना देगी ...... और उस घर के वासियों को स्वर्गवासी । वह वाला स्वर्गारोहण विवाह नहीं है । यहाँ पर किसी दूसरे स्वर्गारोहण विवाह की ओर संकेत है जो कर लेने से करने वाले समझते हैं कि उनके लिए स्वर्ग का रास्ता खुल जाएगा । पर जो बात कहनी थी वह दूसरी थी इसलिए फिर से पैराग्राफ़ बदल रहा हूँ ।
अभी तक उन प्रकारों का नाम तो लिया ही नहीं जो आज कल इन सब से अलग प्रचलित हैं । परिवार द्वारा आयोजित को अरेंज मैरिज, इसके अलावा प्रचलित नाम हैं कोर्ट मैरिज लव मैरिज । एक इनका संकर प्रकार भी प्रचलित हो गया है - मध्यम मार्ग की तरह - मिश्रित अर्थव्यवस्था की तरह - लव कम अरेंज मैरिज । इस प्रकार के विवाह को कई लोग अच्छा मानते हैं ।
लव मैरिज मे यह अच्छाई देखी जाती थी कि किसी अपरिचित से विवाह नहीं हो रहा । दोनों लोग एक दूसरे को जानते समझते हैं और प्यार करते हैं । पर इनमें अपरिपक्वता और परिवार का समर्थन न होने से विवाह के बाद अक्सर रिश्ते भारी पड़ने लगते हैं । इस आधार पर कई रिश्ते स्थायित्व की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं होते थे । अरेंज मैरिज में यह अच्छाई देखी जाती थी कि बड़े बूढ़े लोग देखकर करते हैं । कई बातें जो युवा समझ नहीं पाते । और प्यार होने की वजह से देखना नहीं चाहते । और इनमें गड़बड़ यह होती थी कि कुल जाति और दहेज व्यक्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते थे और उपलब्ध अच्छे रिश्ते भी इस कारण नहीं हो पाते थे और बेमेल भी विवाह हो जाते थे, और हैं भी । लव मैरिज इस गड़बड़ का उपचार है । दोनों की अच्छाइयों और खामियों को देखते हुए व्यक्तियों और परिवारों ने सन्तुलन और समन्वय का रास्ता खोजा - लव मैरिज और अरेंज मैरिज का संकर - लव कम अरेंज मैरिज । व्यक्तियों ने सोचा कि अपने मन की शादी करें पर परिवार को राजी करके जिससे परिवार भी न छूटे । बड़े बूढ़ों ने सोचा कि लव मैरिज से केवल नाम से घृणा क्यों की जाए, अगर इससे अच्छा रिश्ता होता है और हमारे मानकों पर भी सही है, तो क्यों न इनकी पसन्द की ही शादी कर दी जाए । यह रास्ता पहले के समाज में लव मैरिज जैसा निन्दित भी नहीं है और लालच आधारित या रूढ़िवादी भी नहीं । इसका सबसे बड़ा लाभ जो मुझे समझ में आता है वह है दहेज की समस्या का निवारण । जो दहेज नव वर-वधू को नई गृहस्थी बसाने में मदद के लिए दिया जाता था, धीरे धीरे वह विवाह की पूर्व शर्त बन गया । ऐसी शर्त जिसको पूरा होने के लिए समय तो दिया जाता है पर पूरी न होने पर कई अनर्थों का कारण बन जाता है । कुल और जाति की ऊँच नीच का भी इससे समाधान होता है, पर इससे अधिक महत्त्वपूर्ण दहेज की समस्या का समाधान है । यह तो ऐसा सर्वस्वीकृत नियम सा बन गया है कि यदि कोई कहे कि मुझे दहेज नहीं चाहिए, तो देर तक कोई विश्वास नहीं करेगा । अगर देख भी ले कि कुछ नहीं लिया है तो भी सोचेंगे कि सारा कैश ही ले लिया होगा । औरों की तो छोड़िये, दहेज देने वाले भी जल्दी नहीं विश्वास करेंगे कि हाँ इसे सचमुच दहेज नहीं चाहिए । लव कम अरेंज मैरिज में परिवार यह भी चाहते हैं कि शादी उनके मानकों पर खरी उतरे । इसलिए समान जाति में कुल की ऊँच नीच तो चल जाती है पर जाति के बाहर मुश्किल हो जाती है । इसके लिए परिवार को राजी करना बड़ा कठिन काम है । वैसे ही परिवार के लिए इसे स्वीकार करना । लव कम अरेंज मैरिज एक तरह से दो प्रकारों का समन्वय या सन्तुलन है, और उसके भी अन्दर सन्तुलन है जाति की सीमाओं को स्वीकार और जाति के अन्दर की ऊँच नीच की सीमाओं को तोड़कर लव कम अरेंज मैरिज । इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिए जिससे कुछ सामाजिक बुराइयों का इलाज होगा । और इस प्रकार के विवाह में दोनों पक्षों के माता-पिता यदि कोई सहयोग करें तो उसे दहेज की तरह दृष्टि से नहीं देखा जाएगा । लेकिन इसका अर्थ कोई यह कतई मत समझे कि जिन्हें जाति के बाहर प्यार हो गया है वे उसे छोड़कर जाति के अन्दर किसी और को ढूँढ़ें । मैं उन्हें हतोत्साहित नहीं कर रहा । यदि रिश्ता अच्छा है तो आपको इस पर भरोसा रहे । इसमें तो बस यही मेरी सलाह है जैसे उस लव कम अरेंज मैरिज में समन्वय किया जाता है, वैसे इसमें भी प्रेम और परिवार का समन्वय करने की कोशिश करें । यानि विवाह अपने मन का करें यथासम्भव परिवार के आशीर्वाद के साथ । यदि दोनों एक साथ सम्भव न हो पाएँ तो यहाँ मेरी कोई सलाह नहीं है । क्योंकि ऐसे में दूसरे की सलाह नहीं आपका विवेक निर्णायक होना चाहिए । वही आपका आजीवन साथी है, दूसरा कोई नहीं । परिवार और प्रिय अगर साथ नहीं आ सकते तो इनमें से कोई भी छूट सकता है, पर जो तब भी आपके साथ रहेगा - आपका विवेक, आपका धर्म । उससे पूछिए । उसके अनुसार चलिए ।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

गज़ल दो से अधिक शे’र की

कभी कभी पसन्द की चीज़ उबाने लग जाती है
जैसे वह प्यारी तान, जब जबरदस्ती सुनाती है ।

कितना माँगते थे हम कि धूप दो गर्मी बढ़ा दो
आज उस समय की चुभती ठंड हमें भाती है ।।

चाट लगती हैं कभी उन्हें मेरे दिल की आवाज़ें
जिन्हें कभी मेरी छोटी सी डाँट भी सुहाती है ।॥

क्यों ऊब जाते हैं कुछ लोग अपनी बूढी माँ से
जिसकी लोरी के बिना उन्हें नींद नहीं आती है ।॥।

जिसे हम सोचना भी ठीक नहीं समझते
जाने क्यों ऐसी बात भी दिल में कभी आती है ।॥॥

इतना आगे उधर क्यों बढ़ जाते हैं लोग
दिल की आवाज़ ही जिन्हें उधर से लौटाती है ।॥॥।

जाते समय गुस्सा इतना कि रोका ही नहीं
तो अब क्यों दिल की आवाज़ उसे ही बुलाती है ।॥॥॥

क्यों माँगती है ’इस लुटेरे को जल्दी से उठा ले’
वोटर जनता जिस नेता को बहुमत से जिताती है ।॥॥॥।

क्यों लोग देते हैं गालियाँ बड़े शौक से
परावर्तित होने पर जो बड़ी ज़ोर चिलचिलाती है ।॥॥॥॥

बड़े प्रेम से पालती है सृष्टि को ये धरती
उकता जाती है तो इसे प्रलय में डुबाती है ।॥॥॥॥।

रविवार, 27 जून 2010

गीतों की पंक्तियों की जोड़ तोड़

१-
देखने वालों ने क्या क्या नहीं देखा होगा
चलो उसे हम देख डालते हैं और उसके आदि द्रष्टा बन जाते हैं

२-
हर तरफ़ हर जगह हर कहीं पे है, हाँऽ उसी का नूर
...
...
कोई तो है जिसके आगे है आदमी मज़बूर
उसमें क्या पूछना, साफ साफ औरत है

३-
चमकते चाँद को टू....
ओय गंजे चमकते चाँद नहीं चमकती चाँद बोल

४-
देखा तुमको जबसे बस देखा तुमको यारा
समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि तुम्हें ऐसे देखना ठीक है कि नहीं

५-
जाने क्यों लोग प्यार करते हैं
ये भी कोई करने की चीज़ है?
यह तो अपने आप होता है
और यह कोई काम नहीं जो किया जाए, यह भावना है

६-
क्यों आज कल नींद कम ख्वाब ज्यादा है
हल्की नींद में सपने ज्यादा आते हैं
मेहनत नहीं करोगे, इधर उधर दिमाग भटकाओगे तो गहरी नींद कैसे आएगी

७-
तुमको देखा तो ये ख़याल आया
ज़िन्दगी धूप तुम घना साया ।
तुम तो मेरे साथ रहे अरसे से
मैं क्यों तपता रहा छाया में नहीं आया ।
हमने देखी है इन आँखों में महकती खुशबू
इनमें अफ़सोस मेरा चेहरा नज़र नहीं आया ।
इसको क्या कहें मिलना कि या नहीं मिलना
है मेरे पास ही पर अब तक उसे नहीं पाया ।
मैंने दिल खोल रखा है इससे हुआ ऐसा
दिल में तो आया पर उसे न मं पकड़ पाया ।

मंगलवार, 22 जून 2010

शेर

लल्लू ने एक ट्रक खरीदा, उस पर लिखवा दिया - लल्लू का शेर ।
जहाँ से वह ट्रक निकलता, दूसरी गाड़ियों के पहिए पंचर हो जाते (शेर के आगे सभी झुक जाते)
एक दिन एक जीप ने तेजी से उस ट्रक को ओवरटेक किया, ट्रक पंचर हो गया ।
पप्पू ने उस जीप पर लिखवा रखा था - पप्पू की शेरनी

ग़ज़ल सिर्फ़ दो शे’र की

देखने की जो की कोशिश तो नज़र आया है
कुछ न किया बस चाहा था उसे पाया है ।
धुँधली है नज़र थोड़ी अभी साफ़ नहीं
अपना हो गया है या अभी पराया है ।

वाह वाह वाह ...

रविवार, 13 जून 2010

हवाओं में उड़ता हूँ

तुम्हें पता तो होगा
तुम्हीं पे मैं फ़िदा हूँ
तुम्हें है जब से चाहा
हवाओं में उड़ता हूँ
हवाओं में उड़ता हूँ

मैं - आखिरी लाइन दो बार क्यों? यह गाना सुनते हुए मैंने यह लाइन दुहरा दी थी - जैसे आम तौर पर लोग गाना सुनते हुए करते हैं ।
आप - तो इसमें खास बात क्या है जो इसे इस तरह बता रहे हो? हो बिलकुल चाट ही ।
मैं - चाट को इस तरह से हीन नज़र से मत देखो । चाटत्व एक प्रतिभा है । चाट के कहने का तरीका बेवकूफ़ाना होता है पर वह अक्सर बेकार की बातें नहीं करता । कोई बात जो गम्भीर होकर नहीं कह सकता, चाट बनकर आसानी से कह सकता है । इससे गम्भीर दशा के साइड-इफ़ेक्ट से बच जाता है । चाट की बात को समझने के लिए भी प्रतिभा चाहिए होती है जैसे कवि की कविता समझने के लिए सहृदयता ।
आप - कहाँ गाना चल रहा था, फिर चाट महिमा, फिर काव्यशास्त्र । सही कहा था मैंने - हो बिलकुल चाट ही ।
मैं - हाँ मैं मानता हूँ कि मैं चाट भी होता हूँ । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हर बच्चे को होली की पूर्व सन्ध्या पर यह शपथ दिलाई जाती है कि बिना किसी प्रकार के भेदभाव के सभी को चाटेंगे । वही तो निभा रहा हूँ । भले ही मैंने शपथ नहीं ली है, पर जो भी कान सुनते हैं, उसे मन दुहराता तो है ही, इससे आभासीय शपथ हो भी जाती है, जिसमें असली शपथ की तरह बन्धन नहीं होता, क्योंकि हम हरिश्चन्द्र जी से बहुत कम हैं, पर उसे निभाएँ तो अच्छा है ।
आप - अब नीतिशास्त्र पर और हरिश्चन्द्र जी पर चले गए ! सही कहा था मैंने - हो बिलकुल चाट ही । अच्छा अब चुप हो जाओ ।
मैं - क्यों चुप हो जाऊँ । चाट किसी के इशारे पर नहीं चलता । परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई । चाटत्व एक व्यूह होता है जो अनधिकारी को अर्थ तक पहुँचने नहीं देता । जो इस व्यूह को भेदते हुए धराशायी न हो जाए, वही अर्थ तक पहुँच सकता है । तुम्हें सुनना हो तो सुनो, नहीं तो चुपचाप सुना करो । कालो ह्यनन्तः विपुला च पृथ्वी - कोई तो होगा जिसे समझ में आए । मैंने जो बात शुरू की थी उसे पूरी ही नहीं होने दिया, वह केवल इतनी ही बात नहीं थी । उससे जुड़ी और भी बात थी । बात पूरी होने से पहले ही टोंक दिया, तो बात इधर-उधर भटक गई । नहीं तो अब तक हो जाती । थोड़ा सुनने का धीरज नहीं ।
आप - आपकी बात सुनने में बहुत परेशानी होती है, क्योंकि आप बहुत देर तक बोलते रहते हैं और बता नहीं पाते हैं । बड़ी देर तक बताते रहते हैं और उसमें से बात बहुत थोड़ी सी निकलकर आती है जो थोड़ी देर में कही जा सकती है ।
मैं - उस थोड़ी सी बात का मतलब समझो तो बहुत बड़ी बात है, न समझना चाहो तो कोई खास नहीं है । वही बात है कि समझने के लिए अधिकारित्व होना चाहिए ।
आप - ठीक है, जो बात कह रहे थे वह जल्दी पूरी करिये । मुझे जाना भी है ।
मैं - हाँ, तो बात यह थी कि जब मैंने यह लाइन गाने के साथ दोहराई - हवाओं में उड़ता हूँ - उस समय मैं सचमुच हवाओं में उड़ रहा था । मैं जनवरी में रजिस्ट्रेशन और सेमिनार के लिए बंगलौर से दिल्ली आ रहा था - हवाई जहाज से । है न खास संयोग !
आप - बस हो गई बात पूरी? बस इतनी सी बात थी? अब मैं चलूँ?
मैं - नहीं इसके साथ एक और संयोग था
आप - हे भगवान ! कब यह बात पूरी होगी !
मैं - वह दूसरा संयोग था कि मैंने सोचा कि ....
आप - आपकी यही प्रॉब्लम है कि आप सोचते बहुत हैं ।
मैं - हाँ मैं सोचता बहुत हूँ । चिन्तनशील मेरा स्वभाव है, और यही स्वभाव मेरे व्यक्तित्व को सूट करता है । जब भी मैंने अपने स्वभाव से हटकर व्यवहार करना शुरू किया, मेरे आसपास के लोगों को परेशानी होने लगी । इसलिए मैं तो अपने स्वभाव के अनुसार ही करूँगा और बोलूँगा । फिर बात को भटका दिया । हाँ तो मैंने देखना चाहा कि मैंने कब से हवाओं में उड़ना शुरू किया है, तो पता चला कि तभी से, जब पुणे की ट्रेन छूटी थी, नवम्बर २७, २००८
आप - अब मैं चलूँ?
मैं - हाँ मेरी यह बात पूरी हो गई ।
आप - अच्छा नमस्ते
मैं - नमस्ते

करने दो

कहने वाले कहा करेंगे, कहते हैं तो कहने दो
सुनने वाले सुना करेंगे, सुनते हैं तो सुनने दो
लिखने वाले लिखा करेंगे, लिखते हैं तो लिखने दो
पढ़ने वाले पढ़ा करेंगे, पढ़ते हैं तो पढ़ने दो
नदिया को इतना मत बाँधो, कुछ तो खुलकर बहने दो
ठहरो सपने देख रहा हूँ, अभी ख्वाब में उड़ने दो